डाउन सिंड्रोम के कारण, लक्षण और इलाज – Down Syndrome Treatment in Hindi

Written by , (शिक्षा- बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मीडिया कम्युनिकेशन)

क्या आपने कभी किसी बच्चे में कुछ अजीब तरह की चीजें नोटिस की हैं। जैसे- बच्चे का अजीब व सपाट चेहरा, छोटे कान-नाक, आंखों का तिरछापन या जीभ आदि। अगर हां, तो वह बच्चा एक बीमारी से पीड़ित हो सकता है, जिसे मेडिकल टर्म में डाउन सिंड्रोम कहा जाता है। डाउन सिंड्रोम न सिर्फ बच्चे के शारीरिक विकास में बाधा बन सकता है, बल्कि उसका मानसिक विकास भी सामान्य बच्चे की तुलना में धीमा कर सकता है। स्टाइलक्रेज के इस लेख में आप इसी समस्या के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे। इस लेख में डाउन सिंड्रोम के लक्षण और कारण से लेकर इसके इलाज की पूरी जानकारी दी गई है।

चलिए बढ़ते हैं आगे

सबसे पहले डाउन सिंड्रोम की परीभाषा और उसका मतलब जान लेते हैं।

डाउन सिंड्रोम क्या है? – What is Down Syndrome in Hindi

डाउन सिंड्रोम आनुवंशिक विकार होता है। इसमें व्यक्ति के गुणसूत्र (क्रोमोसोम) सामान्य स्तर से अधिक हो सकते हैं। एक शोध के अनुसार डाउन सिंड्रोम से पीड़ित लोगों में 46 के बजाय 47 गुणसूत्र हो सकते हैं (1)। इसकी समस्या बच्चों में जन्म से ही देखी जा सकती है। यहां यह समझना जरूरी है कि एक स्वस्थ्य व्यक्ति की कोशिकाओं में गुणसूत्र के 23 जोड़े होते हैं। इस तरह हमारे शरीर में सामान्य रूप से गुणसूत्र के कुल 46 जोड़े होते हैं। इन 23 में 22 जोड़ों को ऑटोसोम कहा जाता है, जो महिला व पुरुष में समान होते हैं। वहीं, 23वां जोड़ा महिला व पुरुष में अलग-अलग होता है। जहां महिलाओं के इस जोड़े में दोनों गुणसूत्र X होते हैं, वहीं पुरुष के इस जोड़े में एक X गुणसूत्र होता है और एक Y गुणसूत्र होता है (2)। इस प्रकार अधिक डाउन सिंड्रोम के कारण शारीरिक और मानसिक विकलांगता का जोखिम हो सकता है (3)

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अब बात करते हैं डाउन सिंड्रोम के प्रकार के बारे में।

डाउन सिंड्रोम के प्रकार – Types of Down Syndrome in Hindi

डाउन सिंड्रोम के प्रकार मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं। इसके बारे में नीचे विस्तार से समझ सकते हैं (4)

  • फ्री ट्राइसॉमी 21 : यह तब होता है जब बच्चे की कोशिका में गुणसूत्र 21 जोड़े में न होकर 3 की संख्या में होते हैं। लगभग 90 फीसदी मामलों में यह समस्या बच्चे को मातृ दोष (मां की तरफ से) से हो सकती है और सिर्फ कुछ ही मामलों में इसकी समस्या पिता के कारण देखी जा सकती हैं।
  • मोजेक ट्राइसॉमी 21 : जब बच्चे की कुछ कोशिकाओं में गुणसूत्र 21 जोड़े में और कुछ में 3 की संख्या में होते हैं, तो उसे मोजेक ट्राइसॉमी 21 कहा जाता है। इससे ग्रस्त बच्चे में नजर आने वाले लक्षण डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चों की तरह ही होते हैं। यह समस्या फर्टिलाइजेशन के समय कोशिका विभाजन के दौरान होने वाली गड़बड़ी के कारण हो सकती है।
  • रॉबर्टसनियन ट्रांसलोकेशन ट्राइसॉमी 21 : डाउन सिंड्रोम डिजीज का यह प्रकार सिर्फ 2 से 4 फीसदी मामलों में ही देखा जा सकता है। यह तब होता है जब गुणसूत्र 21 का कुछ अतिरिक्त भाग या पूरा भाग किसी दूसरे गुणसूत्र में मिल जाता है। इसके अलावा, रॉबर्टसनियन ट्रांसलोकेशन ट्राइसॉमी 21 के पीछे पारिवारिक और डे नोवो जीन भी जिम्मेदार हो सकते हैं।

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चलिए, अब उन वजहों के बारे में जानते हैं, जिससे हम डाउन सिंड्रोम के लक्षण पहचान सकते हैं।

डाउन सिंड्रोम के लक्षण – Symptoms of Down Syndrome in Hindi

डाउन सिंड्रोम के लक्षण हर किसी में अलग-अलग हो सकते हैं। इन्हें शारीरिक और मानिसक दो भागों में बांटा जा सकता है, जो सामान्य से लेकर गंभीर हो सकते हैं (1) :

शारीरिक तौर पर डाउन सिंड्रोम के लक्षण :

  • जन्म के समय मांसपेशियां का लचीला या कमजोर होना।
  • गर्दन छोटी होना।
  • नाक का चपट होना।
  • छोटे कान होना।
  • छोटा मुंह होना।
  • सिर की हड्डियों के बीच अलग जोड़े होना।
  • हथेली में सिलवट होना।
  • ऊपर की ओर तिरछी आंखें होना।
  • छोटी उंगलियों के साथ चौड़े और छोटे हाथ होना।
  • आंख के रंगीन हिस्से पर सफेद धब्बे होना।
  • शारीरिक विकास सामान्य बच्चों की तुलना में धीमा होना।
  • औसत से छोटी हाइट होना
  • सिर का आकार पीछे से सपाट होना।
  • आंखों का भीतरी कोना नुकीला होने की बजाय गोल होना।

मानसिक तौर पर डाउन सिंड्रोम के लक्षण :

  • मानसिक और सामाजिक रूप से विकसित होने में समय लगना।
  • सोचने-समझने की क्षमता का कम होना।
  • किसी भी काम में देर तक मन न लगना।
  • किसी बात या काम को बहुत धीमी गति से सीखना, जैसे- पढ़ना, लिखना, शब्द बोलना, बात करना आदि।
  • छोटी-छोटी बात पर गुस्सा होना
  • किसी भी बात को लेकर निराश हो जाना।

शारीरिक और मानसिक बाधाओं के अलावा, डाउन सिंड्रोम डिजीज से पीड़ित बच्चों और लोगों में निम्न स्वास्थ्य स्थितियां भी देखी जा सकती हैं :

आगे है और जानकारी

आगे बढ़ते हैं और जानते हैं डाउन सिंड्रोम के कारण 

डाउन सिंड्रोमके कारण – Causes of Down Syndrome in Hindi

जब महिला गर्भधारण करती है, तो भ्रूण को आधे गुणसूत्र अपनी मां से और आधे अपने पिता से मिलते हैं। वहीं, जब ये गुणसूत्र अच्छी तरह से विभाजित नहीं होते हैं, तो शिशु डाउन सिंड्रोम का शिकार हो सकता है (9):

  • 46 की बजाय 47 गुणसूत्र होना।
  • हर कोशिका में गुणसूत्र 21 जोड़ों में होने की जगह उससे ज्यादा होना।
  • ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि अतिरिक्त गुणसूत्र 21 शिशु को मां से मिलते हैं।
  • 5 प्रतिशत से कम मामलों में यह असमानता पिता से शिशु में आती है।
  • कुछ मामलों में गर्भधारण की उम्र भी डाउन सिंड्रोम का जोखिम बढ़ा सकती है। एक अध्ययन के अनुसार, बेहद कम उम्र या फिर देर से गर्भधारण करने वाली महिलाओं को यह जोखिम अधिक हो सकता है (10)
  • यह समस्या आनुवंशिक भी हो सकती है। ऐसे में अगर मां या पिता को डाउन सिंड्रोम की समस्या रही है, तो यह उनके बच्चे को भी हो सकती है।

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डाउन सिंड्रोम का पता कैसे लगाया जाता है, यह जानने के लिए पढ़ते रहें लेख।

डाउन सिंड्रोम का निदान – Diagnosis of Down Syndrome in Hindi

डाउन सिंड्रोम का पता लगाने के लिए गर्भावस्था के दौरान गर्भवती व भ्रूण की उचित जांच की जानी जरूरी है। इसके लिए किस तरह के परीक्षण जरूरी हो सकते हैं, यह आप नीचे पढ़ सकते हैं (11):

  • पहली तिमाही के दौरान स्क्रीनिंग टेस्ट : इस दौरान गर्भवती महिला के खून की जांच की जाती है। इसमें मां के रक्त में प्रोटीन के स्तर की गणना की जाती है। अगर इस परीक्षण में प्रोटीन का स्तर असामान्य पाया जाए, तो यह बच्चे में डाउन सिंड्रोम होने की ओर इशारा कर सकता है। इसके अलावा, भ्रूण में डाउन सिंड्रोम का पता लगाने के लिए गर्भावस्था के 10वें व 14वें सप्ताह के बीच अल्ट्रासाउंड भी किया जा सकता है।
  • दूसरी तिमाही के दौरान स्क्रीनिंग टेस्ट : इस दौरान भी मां के खून का नमूना लिया जाता है। इसमें रक्त में उन पदार्थों की जांच की जाती है, जो भ्रूण में डाउन सिंड्रोम का संकेत हो सकते हैं। इसके लिए ट्रिपल स्क्रीन टेस्ट किया जा सकता है, जो मां के रक्त में तीन अलग-अलग पदार्थों की जांच करने में योगदान दे सकता है। यह टेस्ट गर्भावस्था के 16वें व 18वें सप्ताह के बीच किया जा सकता है। साथ ही गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में क्वाड्रपल स्क्रीनिंग टेस्ट भी किया जा सकता है, जो मां के रक्त में चार अलग-अलग पदार्थों की गणना कर सकता है। यह टेस्ट गर्भावस्था के 15वें व 20वें सप्ताह के बीच किया जा सकता है।

नोट : डॉक्टर ट्रिपल स्क्रीन टेस्ट और क्वाड्रपल स्क्रीनिंग टेस्ट में से किसी एक को या दोनों ही टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। साथ ही अगर इन टेस्ट की रिपोर्ट में कुछ भी असामान्य नजर आता है, तो कुछ अन्य जरूरी परीक्षण किए जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं (11) (4):

  • एमनियोसेंटेसिस (Amniocentesis) : इस टेस्ट में एमनियोटिक द्रव (गर्भाशय में तरल पदार्थ से भरी एक थैली, जिसमें भ्रूण रहता है) के नमूने की जांच की जाती है। यह टेस्ट गर्भावस्था के 15वें व 20वें सप्ताह के बीच किया जा सकता है।
  • कोरियोनिक विलस सैंपलिंग (सीवीएस) (Chorionic Villus Sampling) : इस टेस्ट के दौरान मां के प्लेसेंटा के नमूने की जांच की जाती है। यह टेस्ट गर्भावस्था के 10वें और 13वें सप्ताह के बीच किया जा सकता है।
  • पेरक्यूटेनियल अम्बिलिकल कॉर्ड ब्लड सैंपलिंग (PUBS) : यह टेस्ट करने के लिए मां के गर्भनाल से रक्त का नमूना लिया जाता है। यह टेस्ट गर्भावस्था के 18वें और 22वें सप्ताह के बीच किया जा सकता है।
  • नॉन इनवेसिव प्रीनेटल डायग्नोसिस (एनआईपीडी) : भ्रूण में ट्राइसॉमी 21 का पता लगाने के लिए यह टेस्ट किया जा सकता है। यह एक डीएनए टेस्ट होता है। इसके लिए मां के प्लाज्मा के नूमने की जांच की जाती है।

प्रसव के बाद शिशु पर किए जाने वाले टेस्ट (4):

कैरोटाइप टेस्ट : अगर गर्भावस्था के दौरान मां पर किए गए टेस्ट से असामान्य परिणाम मिलते हैं, तो जन्म के बाद डॉक्टर शिशु में डाउन सिंड्रोम की पुष्टि करने के लिए उसके पेरिफेरल रक्त के नमूने की जांच कर सकते हैं। इसे कैरोटाइप टेस्ट कहा जाता है।

बने रहें हमारे साथ

आगे बात करते हैं डाउन सिंड्रोम का इलाज कैसे किया जा सकता है।

डाउन सिंड्रोम का इलाज – Treatment of Down Syndrome in Hindi

डाउन सिंड्रोम का इलाज करने के लिए मौजूदा समय में कोई विशिष्ट विकल्प उपलब्ध नहीं है। हालांकि, बच्चे के शारीरिक और मानसिक स्थितियों के आधार पर उन्हें उचित समर्थन व विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों की सहायता दी जा सकती है। इस तरह की पहल उनके लक्षणों को सीमित करने में योगदान दे सकते हैं। इसके लिए एनजीओ और संगठन भी शुरू किए गए हैं, जो उचित उपचार में मददगार हो सकते हैं (12)

साथ ही, ध्यान रखें कि इस तरह के कार्यक्रम के लिए जरूरी हो सकता है कि बच्चे को जन्म के कुछ समय के बाद से ही विशेषज्ञों की निगरानी में रखा जाए। जहां पर विशेषज्ञ बच्चे के तीन साल तक की उम्र तक उनकी उचित देखरेख करते हैं और बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास के आधार पर निम्न कौशल सीखने में मदद कर सकते हैं, जैसेः

  • संवेदनात्मक विकास
  • सामाजिक विकास
  • आत्मसुरक्षा का विकास
  • भाषा और ज्ञान संबंधी विकास
  • मोटर स्किल (चलना, उठना, बैठना, दौड़ना आदि)

यह ध्यान रखें कि डाउन सिंड्रोम के लक्षणों का उपचार पूरी तरह से नहीं किया जा सकता है। हालांकि, इस तरह के कार्यक्रम बच्चे की उम्र के साथ-साथ इसके लक्षणों को कम करने में जरूर मदद कर सकते हैं।

अंत तक पढ़ें

चलिए, अब लेख के आखिरी में डाउन सिंड्रोम से बचने के उपाय जान लेते हैं।

डाउन सिंड्रोम से बचने के उपाय – Prevention Tips for Down Syndrome in Hindi

डाउन सिंड्रोम के इलाज के लिए फिलहाल कोई चिकित्सीय विकल्प उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही इससे बचाना भी मुश्किल है, लेकिन इसके प्रभाव को कुछ कम जरूर किया जा सकता है। इसके लिए निम्न बातों का ध्यान रखा जाना जरूरी है:

  • जिन माता-पिता में डाउन सिंड्रोम के लक्षण हैं, उन्हें गर्भावस्था के दौरान लेख में बताए गए डाउन सिंड्रोम टेस्ट कराने चाहिए।
  • गर्भावस्था की योजना बनाने व गर्भवती होने के बाद भी महिला को इससे जुड़े जरूरी नैदनिक परीक्षण कराने चाहिए।
  • साथ ही डाउन सिंड्रोम फेडेरेशन ऑफ इंडिया जैसे समूहों की भी मदद ले सकते हैं। इस तरह के संगठन ऐसे स्पेशल बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए कार्यरत हैं।

इसमें कई संदेह नहीं है कि डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त शिशुओं का पालन-पोषण करना चुनौती भरा हो सकता है। फिर भी उनके मानसिक और सामाजिक कौशल को बेहतर बनाने की प्रक्रिया से आप उन्हें एक सामान्य और खुशहाल जिंदगी जीने में मदद कर सकते हैं। ऐसे बच्चों को उनके परिवार और दोस्तों से भरपूर सहयोग मिलना चाहिए। इससे उनका मनोबल बढ़ सकता है और उनके मन में खुद की स्थिति के सकारात्मक अनुभव आ सकते हैं। साथ ही आप कुछ तरह के डाउन सिंड्रोम सपोर्ट ग्रुप से भी जुड़ सकते हैं, जो भविष्य में इस स्थिति से जुड़े जोखिमों को कम करने में मददगार हो सकते हैं। स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी और जानकारी के लिए आप हमारे अन्य आर्टिकल पढ़ सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या डाउन सिंड्रोम का इलाज किया जा सकता है?

नहीं, मौजूदा अध्ययनों के मुताबिक डाउन सिंड्रोम का इलाज नहीं किया जा सकता है। हां, इसके बचाव के तरीके अपनाकर इसके लक्षण और स्थितियों को नियंत्रित किया जा सकता है। इससे बच्चे के सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है (3)

क्या डाउन सिंड्रोम से पीड़ित लोग एक सामान्य जीवन जी सकते हैं?

डाउन सिंड्रोम से जुड़े एक फाउंडेशन के अनुमान के मुताबिक डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्तियों का औसत जीवनकाल लगभग 60 वर्ष तक का हो सकता है। वहीं, कुछ लोग 80 वर्ष से भी अधिक समय तक जीवन जी सकते हैं (13)

क्या डाउन सिंड्रोम एक विकलांगता है?

हां, डाउन सिंड्रोम एक गुणसूत्रीय व्यवस्था है, जिसमें बदलाव नहीं किया जा सकता है। यह बौद्धिक और शारीरिक अक्षमता का कारण बन सकता है। दुनिया भर में 100 में से लगभग 1 बच्चे में इसके लक्षण देखे जा सकते हैं (4)

Sources

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