क्या मैदा सेहत के लिए अच्छा है? – All About White Flour And How It Affects Health in Hindi

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मैदा का उपयोग अब आम हो गया है। किसी भी खाद्य पदार्थ के टेस्ट को अलग और अच्छा बनाने के लिए इसका इस्तेमाल होता है। समोसे, नूडल्स, मोमोज, गुलाब-जामून, बर्फी, केक व पिज्जा बेस में मैदे का उपयोग होता है। इनकी जगह अगर आटे से बने नूडल्स, केक, मोमा, पिज्जा बेस बना दें, तो लोगों के मन को भाता नहीं है। हर कोई यही कहता है वो स्वाद नहीं आया, जो मैदा युक्त चीजों में होता है। स्वाद के चक्कर में सेहत को भूलने की यह गलती अक्सर हर कोई करता है। इसी वजह से हम स्टाइलक्रेज के इस लेख में मैदा के साइड इफेक्ट्स बता रहे हैं। साथ ही मैदा कैसे बनता है और मैदा क्या होता है इससे जुड़ी जानकारी भी देंगे।

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आर्टिकल की शुरुआत इस जानकारी के साथ करते हैं कि मैदा क्या होता है और मैदा कैसे बनता है।

मैदा कैसे बनता है? – How Is Maida Made In Hindi

मैदा यानी व्हाइट फ्लॉर और रिफाइंड फ्लॉर को गेहूं से बनाया जाता है। इसे बनाने के लिए गेहूं की आउटर ब्रेन यानी बाहरी परत और इनर जर्म लेयर को निकाल दिया जाता है। इसके बाद, जो बीच में सफेद रंग का स्टार्च बचता है यानी एंडोस्पर्म उसको पीसकर मैदा बना लिया जाता है। मैदा बनाते समय गेहूं के ऊपरी भाग व इनर जर्म को हटाने और रिफाइनिंग प्रोसस की वजह से इसके सभी जरूरी न्यूट्रीएंट्स कम हो जाते हैं (1)।

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मैदा कैसे बनता है बताने के बाद हम मैदा खाने के नुकसान के बारे में बता रहे हैं।

मैदा खाने के नुकसान (Maida khane ke nuksan) – Side Effects of Maida in Hindi

आप ऊपर जान ही चुके हैं कि गेहूं की ऊपरी परत को निकालकर मैदा बनाया जाता है। ऐसा करने के कारण इसके सभी जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं, जिस वजह से इसका सेवन सेहत के लिए हानिकारक हो जाता है। चलिए, नीचे विस्तार से मैदा खाने के नुकसान के बारे में जानते हैं।

1. मेटाबॉलिक सिंड्रोम और मधुमेह

मेटाबॉ्लिक (चयापचय) सिंड्रोम कोई एक समस्या नहीं, बल्कि कई बीमारियों का संयोजन यानी काॅम्बिनेशन है। इसमें मोटापा, इंसुलिन रेजिसटेंस, मधुमेह, डिस्लिपिडेमिया और उच्च रक्तचाप शामिल हैं। एक रिसर्च में लिखा है कि रिफांइड फ्लोर का सेवन करने से चार हफ्ते के अंदर ही व्यक्ति चयापचय संंड्रोम से ग्रस्त हो सकता है। माना जाता है ऐसा इसमें फाइबर और अन्य पोषक तत्वों की कमी के कारण होता है। यह सिंड्रोम हृदय रोग, स्ट्रोक और मृत्यु का भी कारण बन सकता है (2)।

2. कमजोर इम्‍यूनिटी

मैदा के साइड इफेक्टस में प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करना भी शामिल है। दरअसल, इम्यून सिस्टम की सभी कोशिकाओं को बेहतर कार्य करने के लिए पर्याप्त पोषण की जरूरत होती है (3), लेकिन मैदा के रिफाइनिंग प्रोसस की वजह से इसके आवश्यक खनिज, विटामिन और फाइटोन्यूट्रिएंट्स लॉस हो जाते हैं (1)। ऐसे में मैदा से बने आहार का अधिक सेवन करने से शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो सकती है, जिसका असर इम्यूनिटी पर पड़ सकता है।

एक रिसर्च की मानें, तो इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी एंटीऑक्सीडेंट और फाइटोकेमिल्स अमेरिकन डाइट में नहीं होते हैं। अमेरिकन डाइट में पिज्जा, बर्गर और अन्य रिफाइंड फ्लॉर से बने खाद्य पदार्थ ही शामिल होते हैं। इसी वजह से मैदा को इम्यून सिस्टम के लिए अच्छा नहीं माना जाता है (4)।

3. हड्डियां की कमजोरी

मैदा का अधिक सेवन हड्डियों को कमजोर बना सकता है। मैदा में हड्डियों के लिए जरूरी पोषक तत्वों जैसे कैल्शियम और मैग्निशियम की कमी होती है (5)। ऐसे में अगर इसका अधिक सेवन किया जाए, तो शरीर में इन न्यूट्रिएंट्स की मात्रा घटती चली जाती है, जिसके कारण धीरे-धीरे हड्डियां कमजोर हो सकती हैं (6)। इसी वजह से मैदा युक्त पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए।

4. फाइबर की कमी

मैदा में फाइबर की कमी होती है। इसे रिफाइन करते समय इसमें फाइबर की मात्रा न के बराबर ही बचती है। इसी वजह से यह स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव भी नहीं डालता है (7)। आटे के मुकाबले इसमें 80 प्रतिशत कम फाइबर होता है (1)। यह फाइबर कब्ज की समस्या को दूर करने और पाचन के लिए आवश्यक माना जाता है (8)।

5. वजन बढ़ने और मोटापे की समस्या

रिफांइड फ्लोर का सेवन करने से वजन बढ़ने और मोटापा की समस्या हो सकती है। इस विषय पर किए गए एक सर्वे में पाया गया कि मैदा से बने फास्ट फूड पेट में आसानी से नहीं पचते। इसी वजह से यह पाचनतंत्र पर बुरा असर डालते हैं। इसके कारण इसे “विरुद्ध आहार” भी कहा जाता है। इसका अधिक सेवन करने से यह कई बीमारी और समस्याओं का कारण बन सकता है, जिसमें मोटापा और अतिरिक्त वजन बढ़ना भी शामिल है (9)।

6. पोषक तत्वों की कमी

हमारे शरीर को स्वस्थ रखने और बीमारियों से बचाने के लिए मिनरल और विटामिन जैसे पोषक तत्वों की जरूरत होती है, लेकिन मैदा बनाते समय फाइबर के साथ ही विटामिन, मिलरल, लिग्नांस (Lignans), फाइटोएस्ट्रोनिन (Phytoestrogens), फिनोलिक कंपाउंड और फाइटिक एसिड (Phytic Acid) जैसे जरूर पोषक तत्व की मात्रा कम हो जाती है (7)। इसी वजह से कहा जाता है कि मैदा का अधिक सेवन करने से शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।

7. मस्तिष्क की समस्याओं का कारण रिफांइड फ्लोर

मैदा के साइड इफेक्टस में मस्तिष्क संबंधी समस्याएं भी शामिल हैं। इस विषय पर हुए शोध में पाया गया है कि मैदा युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने से मस्तिष्क संबंधी विकार हो सकते हैं। खासकर, यह डिमेंटिया यानी एक प्रकार के पागलपन का कारण बन सकता है। रिसर्च में यह भी जिक्र किया गया है कि मैदा अनहेल्दी डाइट है। इसके बारे में लोगों को पता तो है, लेकिन वो यह नहीं समझ पाते हैं कि इसके अधिक सेवन से आगे चलकर मानसिक बीमारी हो सकती है (4)।

8. आंतों में सूजन का कारण

अधिक मात्रा में मैदा खाना आंतों की सूजन की समस्या भी पैदा कर सकता है। दरअसल, यह आंतों में चिपक सकता है, इसी वजह से इसे ‘गलू ऑफ द गट’ कहा जाता है। इसके कारण कई आंतों से जुड़ी कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं (5)। इसके अलावा, मैदा में कई पोषक तत्वों की कमी होती है, जिसमें फाइबर भी शामिल है (7)। लगातार मैदा युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने से शरीर में फाइबर की कमी हो सकती है, जिस कारण छोटी आंत में सूजन की समस्या पैदा होने का जोखिम बढ़ सकता है (10)।

9. हृदय रोग

मैदा के साइड इफेक्टस में मोटापा और मधुमेह के साथ ही हृदय रोग का जोखिम भी शामिल है। एनसीबीआई द्वारा प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, मैदा में पाया जाने वाला कार्बोहाइड्रेट मोनोसाच्चेराइड (Monosaccharide) और डिसाकाराइड (Disaccharide) शुगर से निर्मित होता है। अध्ययन के अनुसार, यह कार्बोहाइड्रेट कई बीमारियों का कारण हो सकता है, जिसमें हृदय रोग भी शामिल है (11)।

10. उच्च रक्तचाप

मैदा का अधिक सेवन कई सारी बीमारियों को न्योता दे सकता है। जी हां, ऊपर हम कई बीमारियों का जिक्र कर चुके हैं। इसके अलावा, यह रक्तचाप को भी बढ़ा देता है। एक शोध में पाया गया है कि मैदा यानी व्हाइट फ्लॉर कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है। यह कार्बोहाइड्रेट उच्च रक्तचाप की समस्या का जोखिम बढ़ा सकता है (11)।

11. भोजन की लत

मैदा का उपयोग कई प्रकार के व्यंजनों में किया जाता है। लंबे समय तक मैदा युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने से उसकी लत लग सकती है। दरअसल, मैदा से बने पाव, बर्गर, मोमो, बिस्कुट, समोसा व पिज्जा आदि को लोग बड़े स्वाद से खाते हैं। घर से बाहर निकलते ही इनमें से किसी ने किसी चीज का सेवन करने की इच्छा मन में जागने लगती है (9)। इसे मैदा युक्त खाद्य पदार्थों की लत कहा जाता है।

दरअसल, मैदे से बनी चीज के स्वाद के कारण इसे खाने के बाद बार-बार खाने का मन करता है। ऐसा होते-होते अगर इसे खाने की फ्रीक्वेंसी यानी आवृत्ति बढ़ने लगे, तो यह आगे चलकर लत का रूप ले सकती है। इसी वजह से इससे बनी चीजों के सेवन से बचना चाहिए या फिर कभी-कभी कम मात्रा में खाना चाहिए।

12. पाचन संबंधी समस्याएं

मैदा युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने से पाचन संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं। इसका कारण भी मैदा बनाते समय होने वाला न्यूट्रिएंट लॉस है। एक रिसर्च पेपर में लिखा है कि मैदा बनाते समय होने वाली रिफाइनिंग के कारण विटामिन और मिनरल्स का बहुत नुकसान होता है, जिस वजह से यह पाचन संबंधी समस्या का कारण भी बन जाता है। इसी वजह से इससे बने खाद्य पदार्थों का सेवन करने से कब्ज की समस्या हो सकती है (12)।

13. ग्लूटेन की मात्रा

ग्लूटेन एक तरह का प्रोटीन होता है, जो ग्लियाडिन और ग्लूटेनिन तत्व से बनता है। इसकी मात्रा आटा, राई, जौ, ओट्स सभी में होती है (13)। मैदा को गेहूं से ही बनाया जाता है, इसलिए यह भी ग्लूटेन युक्त होता है, लेकिन इसमें ग्लूटेन की मात्रा आटे से अधिक होती। ग्लूटेन किसी भी प्रकार का आवश्यक पोषक तत्व प्रदान नहीं करता है। इसके विपरीत यह पेट का फूलना, पेट में दर्द, याददाश्त का कम होना व मानसिक थकान (Foggy mind), अवसाद और बार-बार होने वाले माउथ अल्सर (Aphthous Stomatitis) का कारण बन सकता है (14)।

14. मुंहासों की समस्या

मैदा युक्त आहार का सेवन मुंहासों की समस्या का कारण बन सकता है। शोध के अनुसार मैदा में रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की अधिक मात्रा होती है, जो कई बीमारियों और संक्रमण का कारण बन सकता है। इन्हीं में से एक ई. कोली (E. coli) नामक बैक्टीरिया का संक्रमण है (15)। इस जीवाणु के कारण त्वचा पर मुंहासे हो सकते हैं (16)।

15. कैंसर की समस्या

मैदा से कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। एक रिसर्च पेपर के मुताबिक रिफाइन्ड फ्लॉर कार्बोहाइड्रेट युक्त होता है, जिसकी वजह से शरीर में इसकी मात्रा काफी बढ़ जाती है, जिसे हाई ग्लाइसेमिक लोड कहते हैं। इसके कारण ग्लूकोज का स्तर बढ़ता है और अतिरिक्त इंसुलिन सर्कूलेट (हाइपरइंसुलिनमिया) होने लगता है। यह हाइपरइंसुलिनमिया कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। इस शोध के अनुसार, 30 से 40 प्रतिशत कैंसर का बचाव जीवनशैली और खानपान में बदलाव करके किया जा सकता है (17)। इसी वजह से मैदा युक्त आहार को डाइट में शामिल करने से बचना चाहिए।

खास जानकारी आगे है

अब जानिए आटा और मैदा में से आटा ही फायदेमंद क्यों है।

आटा फायदेमंद तो मैदा क्यों नहीं?

आटा फायदेमंद होता है, क्योंकि आटे में गेहूं के लगभग सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। दूसरी ओर मैदा में न्यूट्रिएंट्स की मात्रा बहुत कम होती है (18)। हम ऊपर बता ही चुके हैं कि न्यूट्रिएंट्स कम होने की वजह से यह बीमारियां और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन जाता है। इसी वजह से गेहूं का आटा फायदेंमद होता है, लेकिन मैदा नहीं।

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आगे हम मैदा को कम खाने के कुछ टिप्स दे रहे हैं।

मैदा कम खाने के लिए जरूरी टिप्स

मैदा का कम सेवन कई बीमारियों को होने से रोक सकता है। यहां हम कुछ टिप्स के माध्यम से बता रहे हैं कि आखिर कैसे डाइट में मैदा को कम किया जा सकता है।

  • सबसे पहले फास्ट फूड का सेवन कम व बंद कर दें।
  • घर से बाहर निकलने पर कुछ खाने को जी ललचाए, तो फ्रूट सलाद खाएं या जसू पिएं।
  • बेकिंग या अन्य चीज के लिए मैदा की जगह गेहूं के आटे का उपयोग करें।
  • पानी पूरी व समोसे आदि को घर में क्रमश: सूजी व गेहूं के आटे से बनाकर खाएं।

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अब जानिए रिफाइंड आटे यानी मैदा की जगह किस चीज का उपयोग कर सकते हैं।

रिफाइंड आटा के स्थान पर क्या खाया जा सकता है?

रिफाइंड आटा यानी मैदे से बनी खाद्य सामग्रियों की जगह पोषक तत्वों से भरा गेहूं का आटा व मल्टी ग्रेन फ्लॉर से बनी चीजें खा सकते हैं। कुछ चीजों में मैदा को चावल के आटे और सूजी से भी रिप्लेस किया जा सकता है। जैसे – गोल गप्पे, पास्ता और रोटी बनाने के लिए। हां, इनका स्वाद मैदा से थोड़ा अलग होता है, लेकिन खाने में ये अच्छे लगते हैं।

मैदा का अधिक सेवन सेहत के लिए कितना नुकसानदायक हो सकता है यह आपने लेख के माध्यम से जान ही लिया है। हम मैदा का सेवन करने से हाेने वाले नुकसान के बारे में बताकर आपको डराना नहीं चाहते। यह सारी जानकारी हमने सावाधानी के तौर पर आपको बताई है, ताकि इसके सेवन को कम व संयमित करके शरीर को स्वस्थ रखा जा सके। स्वाद के लिए सेहत से समझौता करना आगे चलकर परेशानी का सबब बन सकता है। इसी वजह से आज से ही इसकी मात्रा कम कर दें और हो सके तो धीरे-धीरे इसका सेवन छोड़ ही दें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मैदा को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?

मैदा को अंग्रेजी में कई नामों से जाना जाता है। इसे ऑल पर्पस फ्लॉर, प्लेन फ्लॉर, रिफाइंड फ्लोर, रिफाइंड व्हीट फ्लॉर और व्हाइट फ्लोर कहा जाता है।

मैदा सेहत के लिए अच्छा क्यों नहीं है?

मैदा अधिक रिफाइनिंग प्रोसेस से गुजरता है और इसे बनाते हुए गेहूं के पोषक तत्व युक्त परत को हटा दिया जाता है। इसी वजह से यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता।

क्या होगा अगर मैदा का सेवन रोजाना किया जाए?

मैदा का सेवन रोजाना करने से लेख में ऊपर बताए गए सभी नुकसानों का सामना करना पड़ सकता है।

क्या मैदा में स्टार्च होता है?

हां, मैदा स्टार्च युक्त होता है (19)।

आटे की तुलना में मैदा ज्यादा सस्ता क्यों होता है?

ऐसा नहीं है, मैदा और गेहूं की कीमत में ज्यादा फर्क नहीं है। हां, मैदा की तुलना में गेहूं के आटे का सेवन ज्यादा किया जाता है। मैदा का इस्तेमाल फास्टफूड और कुछ मिठाइयों में ही होता है, जबकि गेहूं के आटे की रोज सुबह-शाम उत्तर भारत में रोटियां खाई जाती है। इसकी मांग ज्यादा होने की वजह से यह कुछ राज्यों में महंगा हो सकता है।

क्या सूजी और मैदा एक हैं?

नहीं, सूजी और मैदा दोनों अलग अलग हैं। सूजी खुरदुरी और मैदा महीन होता है।

क्या मैदा त्वचा के लिए फायदेमंद है?

नहीं, मैदा त्वचा के लिए फायदेमंद नहीं है। जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं कि इसमें रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की अधिक मात्रा पाई जाती है, जो मुंहासों का कारण बन सकता है।

19 संदर्भ (Sources):

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Saral Jain

सरल जैन ने श्री रामानन्दाचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, राजस्थान से संस्कृत और जैन दर्शन में बीए और डॉ. सी. वी. रमन विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ से पत्रकारिता में बीए किया है। सरल को इलेक्ट्रानिक मीडिया का लगभग 8 वर्षों का एवं प्रिंट मीडिया का एक साल का अनुभव है। इन्होंने 3 साल तक टीवी चैनल के कई कार्यक्रमों में एंकर की भूमिका भी निभाई है। इन्हें फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, एडवंचर व वाइल्ड लाइफ शूट, कैंपिंग व घूमना पसंद है। सरल जैन संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी व कन्नड़ भाषाओं के जानकार हैं।

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